व्यक्तित्व और भावनाएं कैसे संबंधित हैं? vyaktitv aur bhaavanaen kaise sambandhit hain?

व्यक्तित्व और भावनाएं कैसे संबंधित हैं? vyaktitv aur bhaavanaen kaise sambandhit hain?

🌹"व्यक्तित्व का आधार हैं भावनाएं"🌹

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           🌻व्यक्तित्व का  आधार हैं- भावनाएं! व्यक्तित्व की नींव हैं- हमारी भावनाएं। व्यक्तित्व में मूल रूप से हमारी भावनाएं ही प्रमुख हैं, क्योंकि जैसे हमारे भाव होते हैं, वैसे ही हम विचार ग्रहण करते हैं और उसी के अनुरूप ही हमारा व्यवहार होता है, हमारा आचरण होता है और हमारा व्यक्तित्व फिर वैसा ही बन जाता है। व्यक्तित्व का रंग भावनाओं के उतार चढाव से बदलता रहता है। भावनाएं यदि नकारात्मक हैं, स्वार्थ और अहंकार से जकडी-बंधी हैं तो व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ऐसा व्यक्तित्व विखंडित होता है, परन्तु जब भावनाएं सकारात्मक होती हैं तब व्यक्तित्व प्रकाश पुंज के समान ज्योतिर्मय हो उठता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में भक्ति, करूणा एवं प्रेम का उदय होता है और वह  मानवीय संभावनाओं का शिखर बन जाता है।

व्यक्तित्व और भावनाएं कैसे संबंधित हैं?


🙏सामान्य रूप से हमारी भावनाएं स्वार्थ एवं अहंकार की बेडियो में  बंधी रहती हैं। स्वार्थ एवं अहंकार हमें बांधे रहते हैं। हम एक दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते हैं, समझ नहीं पाते हैं, इसके बाहर जा ही नहीं पाते हैं। इन नकारात्मक भावनाओं से हमारी व्यक्तित्व की संरचना ही बदल जाती है। नकारात्मक भावनाओं में अनायास कुछ चीजें पैदा हो जाती हैं। भावनाओं में बिक्षोभ भर जाता है। छोटी-छोटी बातों से हम चिंतित हो उठते हैं, परेशान हो जाते हैं। जब भी कभी हम अकेले होते हैं, तब भय एवं संदेह के कंटक मन में चुभने लगते हैं और फिर हम वहां से भागने का प्रयत्न करने लगते हैं, किसी के साथ होने की कोशिश करते हैं, परन्तु तब भी ये कंटक हमारा पीछा नहीं छोडते हैं।

                 🌸जब भावनाओं में वक्षोभ पैदा होता है तो हमारे अंदर एक असुरक्षा का भाव पैदा होता है हम असुरक्षा के भाव से चारों ओर से घिर जाते हैं। तब ऐसा लगता है कि कोई हमारा अपना नहीं है, कोई हमारे साथ नहीं है और कोई हमारा विश्बास नहीं करता। हमें ऐसा लगता है जैसे सभी की आंखें हमें आलोचना की दृष्टि से देख रहीं हैं। कोई कुछ भी कहता है, उसका मंतव्य कुछ भी हो, उसके विचार कैसे भी क्यों न हो, हमें लगता है कि वह हमारे बारे में ही कुछ कह रहा है, हमारी ही कमजोरी की ओर संकेत कर रहा है, हमारा ही उपहास कर रहा है।

              🌺ऐसी स्थिति में हमें ऐसा लगता है कि जीवन यहीं थम गया है, रूक सा गया है। हम आगे का कुछ सोच नहीं पाते हैं। भावनाएं अस्थिर रहती हैं तो हमारे अंदर इसी तरह की असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती हैं। हमें  अनिश्चितता सताती है कि कल क्या ?आगे क्या ? हम तो वर्तमान में ठहर ही नही पाते, लगता है कि हमारा कुछ खो गया है।

              🌼ऐसे में हम वर्तमान में या अतीत की कडुबी यादों को याद करके परेशान रहते हैं या फिर भविष्य की चिंता करने लगते हैं। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करें? हमें चारों ओर से केबल अंधेरा ही अंधेरा दिखाई फडता है, उजाले की कोई किरण भी नजर नहीं आती है। हमारे देखने, सुनने, समझने की एक

 सीमा है, उसके आगे न तो हम देख पाते हैं, सुन पाते हैं और नही समझ पाते हैं। अनिश्चितता हमें प्रताडित करती है। यह सब नकारात्मक भावनाओं के कारण है।

              🏵️नकारात्मक भावनाओं से हमारे संबंध दूषित और दुर्बल होते हैं। हमारे संबंधों में भी टकराव सा बना रहता है। ऐसे लोग जिनकी भावनाएं नकारात्मक होती हैं- वे लोग अनिश्चित रहते हैं, असुरक्षित रहते है और अविश्वास से भरे रहते हैं। इन लोगों को किसी पर विश्बास नहीं होता है और ये किसी के साथ निर्वाह भी नहीं कर पाते हैं।

                 🌼इन सबका परिणाम निराशा के रूप में आता है। ऐसे लोग जीवन को सकारात्मक रूप से, सम्यक ढंग से, सही रीति से देख ही नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति में कई बार तो ऐसा लगता है कि सब  कुछ समाप्त हो गया। फिर हम सोचते हैं कि अब हम क्या करें? भावनात्मक उद्वेग में, भावनात्मक विक्षोभ में कई बार लोग आत्म हत्या भी कर लेते हैं।

                🌷इसके विपरीत जब भावनाएं सकारात्मक होती हैं, स्थिर होती हैं तो मन में विक्षोभ नहीं आता है, विक्षुब्धता नहीं होती है। जीवन में घटनाएं तो वही घटती है, घटनाओं को रोका नहीं जा सकता है, क्योंकि प्रकृति की हलचलें हमारे बस में नहीं हैं, परन्तु इन घटनाओं के प्रति हमारा रवैया बदल जाता है। भावनाएं जब स्थिर होती हैं तो हमारे अंदर आत्म विश्बास होता है। आत्म विश्बास से जुडा हुआ  और एक पहलू है- ईश्बरीय विश्बास। जब भावनाओं में विक्षोभ होता है तो वह विखंडित व्यक्तित्व की ओर बढता है। 

               🍁अगर भावनाएं स्थिर होती हैं तो व्यक्तित्व में अखंडता आती है, समग्र व्यक्तित्व का आविर्भाव होता है ओर हम एक इंटिग्रेटेड पर्सनिलिटी की ओर बढते हैं। इससे हमारे अंदर आत्मविश्बास पैदा होता है , हम ईश्बरीय विश्बास की ओर बढते हैं। जब हम ईश्बरीय विश्बास की ओर बढते हैं तो हमारे संबंध प्रगाढ़ होते हैं। ऐसे में जिन संबंधो को हम निभाते हैं,  बहुत गहराई से निभाते हैं, क्योंकि संबंध तभी टूटते हैं, जब हम अपने प्रति नकारात्मक होते हैं और औरों के प्रति भी नकारात्मक होते हैं।

               🌸भावनाएं सकारात्मक होती हैं तो संबंध सुदृढ एवं मजबूत होते हैं। हम अपने प्रति नकारात्मक होते हैं तो और औरों के प्रति भी नकारात्मक होते हैं। सकारात्मक भावनाओं में प्रेम पनपता है। हमारे अंदर विश्बास पैदा होता है। भावनाओं में प्रेम का क्या अर्थ है ? वास्तव में प्रेम भावनाओं की ही व्यापकता है, भावनाओं ही की पावनता है। सच्चे प्रेम की अनुभूति दिव्य होती है। सामान्य जीवन में इसे समझना आसान नहीं होता है, क्योंकि हम ईर्ष्या-क्रोध, आसक्ति अहंकार से घिरे रहते हैं। इनके कारण हमारा व्यक्तित्व दुर्बल, कमजोर एवं खंडित बना रहता है, परन्तु जहां भावनाओं में सकारात्मकता होती है, वहां प्रेम का अंकुरण होता है और जीवन में प्रकाश एवं आशा भर जाती है। जब जीवन में आशा आती है, तब हम हमेशा उज्जवल जीवन की ओर देखते हैं।

                जीवन में सकारात्मक भावनाएं जब घनीभूत होती हैं, उनमें सघनता होती है, उनमें घनत्व पैदा होता है तो श्रद्धा पैदा होती है। श्रद्धा सकारात्मक और पवित्र भावनाओं का ही रूप है और यही श्रद्धा विकसित होकर भक्ति बनती है। जिसमें भक्ति होती है उसे, भक्त कहते हैं। इस प्रकार भावनाएं नकारात्मक हैं तो पर्सनलिटी डिसइंटिग्रेटेड होती ( विखंडित व्यक्तित्व ) होती है और भावनाएं सकारात्मक हैं तो पर्सनिलिटी इंटिग्रेटेड ( अखंडित व्यक्तित्व ) होती है। भावनाएं नकारात्मक हैं तो मनुष्य विभक्त होता है। और भावनाएं सकारात्मक हैं तो मनुष्य भक्त होता है। मनुष्य विभक्त है या भक्त है यह उसकी भावनाओं पर निर्भर करता है। विभक्त मनुष्य हर परिस्थिति में दुःखी रहता है, परेशान रहता है, जबकि भक्त हर परिस्थितियों में सुखी, संतुष्ट एवं शांत रहता है, क्योंकि भक्त का व्यक्तित्व अखंड एवं अविभक्त होता है। 

            🌼भक्त खंडित नहीं होता है, विखंडित नहीं होता है, वह तो अखंडित होता है। भक्त का व्यक्तित्व बिखरा हुआ नहीं होता है। उसका चित्त बंटा हुआ नहीं होता है, उसके चित्त में बिखराव नहीं होता है। उसके प्रयासों में एकजुटता होती है। वह कभी शिकायत नहीं करता है, वह कभी परेशान नहीं रहता है और न किसी को परेशान करता है। वह तो सुख बांटता है और बदले में दूसरों की कष्ट, पीडा और परेशानी को कम करने का प्रयास करता है। वह जहां भी रहता है, दीपक की भांति सदा प्रकाश बांटता रहता है, क्योंकि उसकी भावना इतनी पावन, पवित्र एवं परिष्कृत हो जाती है कि वह औरों में भी इसका संचार करने लगता है।

               🌺नकारात्मक भावना व्यक्ति को दुर्बल एवं मनोरोगी बनाती हैं और उसका व्यक्तित्व दोषपूर्ण एवं विभक्त हो जाता है। सकारात्मक भावना व्यक्तित्व को मजबूत एवं आशावान बनाती है। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व अविभक्त होता है और वही भक्त कहलाता है। अतः हमें अपनी भावनाओं को शुद्ध एवं पवित्र बनाना चाहिए और अपने व्यक्तित्व को अखंड बनाना चाहिए।

 

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