सत्संग की महिमा अपार है।

सत्संग की महिमा अपार है।

सत्संग की महिमा है अपार

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सत्संग की महिमा अपार है। यह जीवन को बदलने की एक विधा है। जिस तरह कुसंग अपना नकारात्मक प्रभाव छोडता है, उसी तरह सत्संग भी अपना सकारात्मक प्रभाव छोडता है। सत्संग के प्रभाव से व्यक्ति का व्यक्तित्व ही बदल जाता है। सत्संग से व्यक्ति की समस्याओं का समाधान  होता है व उसे जीवन में आगे बढने का मार्गदर्शन मिलता है। सत्संग से न केवल व्यक्ति का विवेक जाग्रत होता है, अपुति सत्संग से अज्ञान व भ्रांति  का भी नाश होता है।

सत्संग की महिमा अपार है।


महाभारत में एक सुन्दर घटना आती है। युद्ध से एक दिन पहले युधिष्ठिर बहुत परेशान व दुःखी थे। वे कहने लगे की मुझे अपने रिश्तेदारों स, अपने पितामह से, अपने गुरू से युद्ध करना पडेगा। जब युधिष्ठिर बहुत परेशान हुए, तब अर्जुन ने उनको ज्ञान दिया। अर्जुन ने युधिष्ठिर को ज्ञान तब दिया, जब समस्या युधिष्ठिर की थी, लेकिन जब अर्जुन स्वयं इसी बात से परेशान हुए तो वे खुद को समझा नही पाए, स्वयं को ज्ञान नही दे पाए, तब उन्हे श्रीकृष्ण के सत्संग की जरूरत महसूस हुई। जब तक समस्या किसी और की होती है, हम सब वडे ज्ञानी बन जाते हैं, लेकिन जब हम अपनी समस्याओं का स्वयं निबारण करने में सक्षम होते है, तभी हमें स्वयं को सच्चा ज्ञानी समझना चाहिए। तभी इस बात की परख होगी कि हमारा ज्ञान कितना स्थिर है।


हमारा मन आग की तरह है। आग में रबर डालो तो चारों तरफ उसकी बदबू फहल जाती है। आग में चंदन डालो तो चारों तरफ उसकी खुशबू फैलती है, तो मन रूपी आग में सुबह से श्याम तक क्या पड रहा है? यदि अच्छे विचार इस हवन कुण्ड में पड रहे हैं तो व्यक्ति के आस पास के माहौल में एक खुशी, एक आनंद प्रवाहित होगा और यदि अशुभ विचार इस हवन कुण्ड में पड रहे हैं तो आस पास के माहौल में चिंता, तनाव, अवसाद, निराशा का कुहासा फैलेगा।


यदि किसी परिवार के सदस्य आपस में मिलकर नहीं रहते, अलग अलग रहते हैं लडाई झगडा करते हैं, यानि उस घर के लोग सत्संग नहीं करते, कुसंग करते हैं तो उस घर में तनाव का माहौल ज्यादा होगा। सत्संग का मतलव सिर्फ प्रवचन सुनना नहीं है। सत्संग का मतलब है कि आप किस तरह की किताबें पढ रहे हैं, किस तरह की बातें सोच रहे हैं, किस तरह के ल़गों से मिल रहे है, इस तरह जो भी कार्य कर रहे हैं, जिनका प्रभाव हम तक पड सकता है, वो सभी संग-सानिध्य-संपर्क के अंतर्गत आते हैं। यदि संग का प्रभाव सकारात्मक पड रहा है, तो वह सत्संग हुआ और यदि संग का प्रभाव नकारात्मक व्यक्ति के पर   पड रहा है, तो वह कुसंग हुआ।


सत्संग का प्रभाव इतना जबरदस्त है कि इससे व्यक्ति के जीवन की दिशाधारा को पूर्णतया बदला जा सकता है, उसके व्यक्तित्व को आमूलचूल परिवर्तित किया जा सकता है। यह सत्संग का ही प्रभाव होता है कि महापुरूषों का थोडे समय का सानिध्य-सम्पर्क भी व्यक्ति के मन व जीवन को परिवर्तित कर देता है, उदाहरण के लिए डाकू अंगुलिमाल का बुद्ध से संपर्क होने पर बह बौद्ध भिक्षु बन गया। इसलिए आध्यात्म मार्ग में आगे बढने के लिए सत्संग की बडी महत्ता गाई गयी है।


केवल आध्यात्म क्षेत्र में ही नहीं, जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढने के लिए सत्संग चाहिए, क्योंकि कुसंग से व्यक्ति भटक जाता है और मनोवांछित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता। उदाहरण के लिए यदि व्यक्ति को आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढना है तो उसे शास्त्रों को पढना चाहिए, आध्यात्मिक व्यक्तियों का सानिध्य लेना चाहिए व उनके गुणों को धारण करना चाहिए। इस तरह व्यक्ति यदि किसी भी क्षेत्र में आगे बढना चाहे, तो उस क्षेत्र से संबंधित व्यक्तियों व विचारों का संग उसे आगे बढाने में सहायक होता है। अतः हमें अपने संग के प्रति होशपूर्ण रहना चाहिए। क्या हमारा संग हमें हमारे लक्ष्य तक ले जाने में सहायक है या हमें भटकाता है? इस पर सोच विचार करना चाहिए और अपना संग सुधारते हुए सत्संग को अपनाना चाहिए।


 

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