राम मंदिर संघर्ष के वह गुमनाम चेहरे जिनका योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता(ayodhya Ram Mandir)

राम मंदिर संघर्ष के वह गुमनाम चेहरे जिनका योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता(ayodhya Ram Mandir)

अयोध्या में राम मंदिर का सपना सैकड़ों साल बाद अब साकार होने जा रहा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अपने हाथों से श्री राम मंदिर का भूमि पूजन किया ऐसे में इस शुभ मौके को देखने के लिए कई दिक्कत अपनी पूरी जिंदगी राम मंदिर के संघर्ष में गुजार दी, जिनमें से कई नाम आज गुमनामी के अंधेरे में खो गए हैं लेकिन उनकी जिक्र के बिना राम मंदिर का यह उत्सव अधूरा है

केके नायर: 1 जून 1949 को केरल के अलप्पी के रहने वाले केके नायर फैजाबाद के कलेक्टर बने  जिसके बाद उनके कार्यकाल के दौरान 23 दिसंबर 1949 को विवादित स्थल पर राम की मूर्ति रखी गई थी जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सूबे के सीएम रहे गोविंद बल्लभ पंत के कई बार कहने के बावजूद के के नायर ने मूर्ति हटानेे के आदेश को नही माना! जिसके बाद हिंदुत्व के प्रतीक बन गए

इधर हिंदू समुदाय के तेवर को देखते हुए कांग्रेस सरकार पीछे हट गई थी शुरुआती दौर में अयोध्या आंदोलन को धार देने मे केके नायर का अहम योगदान था

गोपाल सिहं विशारद: आजादी के बाद राम मंदिर के लिए पहला मुकदमा एक दर्शनार्थी भक्त गोपाल सिहं विशारद ने जनवरी 1950 को सिविल जज, फैजाबाद की आदालत मे दायर किया था वह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन जिला गोंडा के रहने वाले और हिंदू महासभा के जिला अध्यक्ष थे गोपाल सिंह विशारद ने जिला अदालत में जहूर अहमद और अन्य मुसलमानों के खिलाफ मुकदमा दायर कर रहा कि जन्मभूमि पर स्थापित  भगवान श्री राम और अन्य मूर्तियों को हटाया ना जाए और उन्हें दर्शन व पूजा के लिए रोका ना जाए साथ ही भगवान श्री राम  दर्शन के प्रवेश द्वार एवं आने आने जाने के मार्ग बंद ना करें और पूजा दर्शन में  किसी प्रकार की विघ्न बाधा ना डालें अयोध्याा आंदोलन को आदालत में ले जाने के लिए विशारद की अहम भूमिका रहीं हैं  

श्रीश चंद्र दीक्षित: यूपी के रिटायर्ड श्रीश चंद्र दिक्षित ने  राम मंदिर आंदोलन में कारसेवकों के लिए नायक की भूमिका अदा की थी श्रीश चंद्र दीक्षित 1982 से लेकर 1984 तक डी जी पी रहे हैं और रिटायर होने के बाद विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय उपाध्यक्ष बन गए! बताया जाता है 1990 में जब कारसेवा के लिए  साधु संत अयोध्या कूच कर रहे थे तो प्रशासन ने अयोध्या में कर्फ्यू लगा रखा था और पुलिस ने विवादित स्थल के डेढ़ किलोमीटर दायरे में बैरिकेडिंग कर रखी थी जिसके बाद 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवकों की भीड़ बेकाबू हो गई जिसके बाद पुलिस ने कारसेवकों पर गोली चला दी तो कार सेवकों के ढाल बनकर श्रीश चंद्र दिक्षित सामने आए थे पूर्व डीजीपी को सामने देख पुलिस वालों ने गोली चलाना बंद कर दिया इस तरह कारसेवकों की जान बचाने में उन्होंने अहम भूमिका अदा कीं

सुरेश बघेल: 30 साल पहले  1990 में राम मंदिर आंदोलन में शामिल होकर बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिराने की पहली और मजबूत कोशिश करने वाले वृंदावन हिंदूवादी नेता सुरेश बघेल का नाम शायद ही किसी को याद है उन्होंने मंदिर के लिए कोर्ट-कचहरी जेल धमकियां और परिवार से दूर ही सब कुछ झेला हैं

इस वक्त में निजी कंपनी में ₹6000 प्रतिमाह काम करके गुजर बसर कर रहे हैं




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