Corona: Bodhidarma ने चीन को कौन सा रास्ता दिखा दिया था? जिसके आगे पूरा देश झुक गया.

Corona: Bodhidarma ने चीन को कौन सा रास्ता दिखा दिया था? जिसके आगे पूरा देश झुक गया.

बोधिधर्मन ने चीन को कौन सा रास्ता दिखा दिया था? जिसके आगे पूरा देश झुक गया.


Corona का कहर चाइना से शुरू हुआ और पूरी दुनिया में धीरे धीरे फैल गया हालांकि चाइना से इससे पहले भी कई बीमारियां फैल चुकी है 2003 में sars यहीं से निकला था चाइना से निकलकर फ्लैग और फ्लू भारत को प्रभावित कर चुके हैं खैर एक बात इससे भी बड़ी है वह यह कि चाइना में जब भी कोई महामारी फैलती है भारत के एक महान शख्स का नाम सामने आ जाता है जिसने कभी चाइना के गांव को महामारी से बचाया था जिनका नाम है Bodhidarma
कहने को तो वह एक बौद्ध साधु थे  लेकिन उनके ज्ञान ने उनको अलग ही मुकाम पर लाकर खड़ा किया था 

आज के समय में ज्यादातर लोग सोचते हैं कि कुंफू, मार्शल आर्ट चाइना और जापान जैसे लोगों ने खोज की है जबकि ऐसा नहीं है चाइना में मार्शल आर्ट लाने का श्रे्य Bodhidarma उन्होंने अपने ज्ञान से चाइना के लोगों को लड़ने की तकनीकी सिखाई इतना ही नहीं बहुत सी चीजों में Bodhidarma ने ही चीन को रूबरू करवाया

Corona महाकाल के बीच इतिहास के पन्नों में झांककर उस महान शख्सियत को जानना बहुत जरूरी है  जिसने सैकड़ों साल पहले भारत से निकलकर china को नया रास्ता दिखाया था bodhidarma की जिंदगी शुरुआत से ही साधु वाली रही थी वह किसी बौद्ध साधु के वंशज भी नहीं थे असल जिंदगी में तो bodhidarma एक रईस राजकुमार थे माना चाहता है कि बोधिधर्मन दक्षिण भारत के पल्लव राजवंशों में जन्मे थे  उनके पिता कांचीपुरम के राजा थे बचपन से ही bodhidarma के पास असीम दौलत थी किसी भी चीज की कमी उनके लिए नहीं थी ऐसो आराम के साथ वह अपना पूरा जीवन बिता सकते थे मगर ऐसा नहीं हुआ बोधिधर्मन आसान जिंदगी जी सकते थे लेकिन उन्होंने एक आम जिंदगी जीना चुना कहते हैं कि बोधिधर्मन बचपन से ही बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हो गए थे बौद्ध साधुओं का सरल जीवन और आंतरिक शांति ढूंढने का प्रयास उन्हें बहुत अच्छा लगता था बोधिधर्मन अपने तीन भाइयों में से सबसे छोटे थे शुरुआती दिनों में बोधिधर्मन ने लड़ने की कलाएं भी सीखी और युद्ध कला में उन्हें महारत हासिल थी मगर वक्त के साथ उनका ध्यान युद्ध से हटके बौद्ध धर्म की तरफ जाने लगा इसके साथ ही उन्होंने कम उम्र में ही बौद्ध साधु बनने की ठान ली और ध्यान सीखने से अपनी शुरुआत की.

बोधिधर्मन ध्यान सीखने से अपने दिमाग को कैसे शांत किया जाए यह सिखाया जाता है बहुत ही धर्म में इसे ऐसा सीखा कि उन्हें 28 बौद्ध धर्म का गुरु बना दिया गया जब बोधिधर्मन ध्यान की शिक्षा में माहिर हो गए तो उन्हें प्रचार के लिए चीन भेज दिया गया वहां से शुरू हुआ बोधिधर्मन का प्रमुख सफर वही कठिन सफर के बाद बोधिधर्मन चाइना के एक गांव में पहुंचे कहते हैं कि इस गांव के भविष्य वक्ताओं के अनुसार यहां बहुत बड़ा संकट आने वाला था bodhidarma के यहां पहुंचने पर गांव वालों ने उन्हें इसका संकट समझ लिया ऐसा जानकर उन्हें एक गांव से खदेड़ दिया गया फिर वह गांव के बाहर रहने लगे उनके वहां से चले जाने पर गांव वालों को लगा कि संकट चला गया

दरअसल संकट तो महामारी के रूप में वहां आने वाला था और वह आ भी गया लोग बीमार पड़ने लगे गांव में अफरा-तफरी मचने लगी गांव के लोग बीमारी से ग्रसित बच्चों और भी लोगों को गांव के बाहर छोड़ देते थे ताकि किसी अन्य को यह रोग ना लगे bodhidarma चुंकी एक आयुर्वेदाचार्य थे  उन्होंने ऐसे लोगों की मदद की और उन्हें मौत के मुंह में जाने से बचा लिया, तब गांव के लोगों को समझ में आया कि यह व्यक्ति हमारे लिए संकट नहीं है बल्कि संकट हरता के रूप में सामने आया है गांव के लोगों ने सा सम्मान उन्हें गांव में शरण दी. बोधिधर्मन ने गांव के समझदार लोगों को जड़ी-बूटी कुटने और पीसने के काम में लगा दिया  इस तरह से गांव के लोगों को उन्होंने चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर गांव को महामारी से बचाव किया खाना कि कुछ लोग मानते हैं कि साल 495 में बोधिधर्मन के चाइना जाने से 30 साल पहले एक बौद्ध साधु चीन में जाकर सावलीन मंदिर की शुरुआत कर चुका था जब बोधिधर्मन वहां गए तो उनका काम था कि शिक्षा को और भी आगे बढ़ाना मगर उनका काम इतना भी आसान नहीं था चाइना पहुंचने पर बोधिधर्मन सीधा उसी मंदिर पर गए महंत तो लोगों को उन्होंने बताया कि वह भारत से आए हैं और वह योगा के जरिए ध्यान लगाना सिखाना चाहते हैं मगर मंदिर की अधिकारियों ने उन्हें मंदिर में प्रवेश करने से मना कर दिया मंजूरी नहीं मिलने पर भी बोधिधर्मन ने कुछ नहीं कहा और पहाड़ पर और भी ऊपर चले गए व एक गुफा में ध्यान लगाने लगे

मंदिर अधिकारियों को लगा कि बोधिधर्मन कुछ वक्त बाद वहां से चले जाएंगे लेकिन जब ध्यान लगाने लगे तो उन्होंने उसे ही अपना घर बना लिया कहा जाता है कि बोधिधर्मन में करीब 9 साल तक उस गुफा में ध्यान लगाया था 9 साल की तपस्या के बाद मंदिर अधिकारियों ने बोधिधर्मन को सावलीन मंदिर पर आने की इजाजत दी जैसे ही बोधिधर्मन मंदिर के अंदर गए उन्होंने देखा कि वहां कोई भी व्यक्ति तंदुरुस्त नहीं है इसके लिए उन्होंने जो कसरत गुफा में की थी उन्हें ही मंदिर के लोगों को सिखाया और यही आगे चलकर मार्शल आर्ट के रूप में सामने आए यह बहुत ही कारगर थी इससे शरीर भी स्वस्थ रहता था और बिना हथियार के लड़ना भी इसके कारण आ जाता था देखते ही देखते यही विद्या चाइना से निकलकर आसपास के देशों में पहुंच गई बोधिधर्मन की सिखाई गई इस विद्या को जैन बुद्धिस्म का नाम दिया गया लकी बोधिधर्मन को मार्शल आर्ट का ही खोजकर्ता श्रे्य नहीं माना जाता उन्होंने एक और चीज की खोज की जिसे आज के समय में चाय के रूप में लोग जानते हैं चीन को बोधिधर्मन ने एक नया रास्ता सुझाव कर दिया था जो स्वस्थ और बीमारियों से दूर था चीन में उन्होंने लोगों को शिक्षा देने और मार्शल आर्ट ट्रेनिंग देने और भी बहुत कुछ ज्ञान देने में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर. माना जाता है कि बोधिधर्मन के 4 शिष्य थे और वह उनकी आखिरी समय में भी साथ दे बोधिधर्मन ने उनसे कहा था कि वह बौद्ध धर्म का प्रचार करें और लोगों को ध्यान लगाने को प्रेरित करें और इसी के साथ उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली और वह दुनिया से चले गए मगर उनकी सिखाई बात आज भी जिंदा है.

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